Sunday, July 18, 2021

Prajna Mantra 5

*प्राज्ञ मंत्र*
प्रिय आत्मन्!
        शास्त्र भगवान के स्वरूप का आंशिक वर्णन करते हैं क्योंकि वे पूर्णतः वर्णन करने में सर्वथा असमर्थ हैं। यही कारण है कि वे उसे "नेति नेति" कहते हैं।
        अगर आप उन्हें जानना चाहते हो, पहचानना चाहते हो तो यह आवश्यक है कि पहले "स्वयं" को जानो, अपने "आत्म-स्वरूप" को पहचानो और अपने अंदर उन्हें ढूंढने का प्रयास करो ।
         आत्म-चिंतन, आत्म-विश्लेषण और आत्म- अनुसंधान से जो आत्मज्ञान और आत्मानुभव प्राप्त होता है वही अन्ततः भगवत्-साक्षात्कार एवं  भगवत्कृपा प्राप्ति का साधन बनता है। अतः व्यक्ति को नित्य-निरंतर निश्चित रूप से आत्म-विश्लेषण करते रहना चाहिए । 
         ये बात ठीक है कि आप स्थूल हैं मगर आपके अन्दर जो शक्ति है, जो ईश्वरीय सत्ता है, वह अत्यंत सूक्ष्म है और वह समस्त प्रकार के नाम-रूप-उपाधियों से परे भी है। लेकिन हम उसे जानना और समझना चाहते हैं, 
इसलिए हमने उसे एक संज्ञा दी है, एक रूप दिया है । अब हम उसे ब्रह्म कहें, परमात्मा कहें या भगवान- बात एक ही है। 
         अतः हमारा कर्तव्य है कि अब हम उस एक को ही जानते, मानते और समझते हुए उसका ही हो जायें, उसमें ही समा जायें और वही हो जायें ।
                 - स्वामी सत्यप्रज्ञानन्द सरस्वती

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